हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी का पर्व मनाया जा रहा है। इसको बछ बारस, वाघ बारस या वसु बारस द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कई अन्य राज्यों में विशेष रूप से मनाया जाता है। गोवत्स द्वादशी पर माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना के साथ व्रत करती हैं। इस बार यह पर्व 05 नवंबर 2026 को मनाया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस पर्व की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में…
तिथि और मुहूर्त
वैदिक पंचांग के मुताबिक कार्तिक कृष्ण द्वादशी तिथि की शुरूआत 05 नवंबर की सुबह 10:35 मिनट पर हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 06 नवंबर 2026 की सुबह 10:30 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। वहीं प्रदोष काल पूजा मुहूर्त शाम 05:33 बजे से रात 08:10 बजे तक है।
पूजन विधि
इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने से बाद साफ कपड़े पहनें। इसके बाद गाय और बछड़े को साफ पानी से स्नान कराएं और उनको रोली और हल्दी से तिलक करना चाहिए। फिर फूल, धूप, अक्षत और दीप आदि अर्पित करें। अब गाय और बछड़े को गुड़, मोठ, भीगा हुआ चना और हरा चारा खिलाना चाहिए। फिर संतान की खुशहाली के लिए प्रार्थना करें और गोवत्स द्वादशी व्रत कथा सुनें। अगर गाय और बछड़ा न हो, तो उसकी तस्वीर और मिट्टी की प्रतिमा का पूजन किया जा सकता है।
व्रत कथा
बछ बारस की प्रचलित लोककथा के अनुसार, एक साहूकार ने गांव में एक बड़ा तालाब बनवाया था। लेकिन इसमें लंबे समय तक पानी नहीं रुकता था। तब साहूकार ने पंडित को बुलाया और कहा कि इस तालाब में पानी तभी भरेगा, जब तुम या तो बड़े बेटे या अपने बड़े पोते की बलि दोगे। तब साहूकार ने अपनी बड़ी बहू को मायके भेज दिया और पीछे से अपने बड़े पोते की बलि दे दी। इतने में गरजते हुए बादल आए और पूरा तालाब पूरा भर गया।
जिसके बाद बहू तक खबर पहुंची कि उनके ससुर एक बड़ा यज्ञ कर रहे हैं। इस बात की जानकारी मिलने के बाद बहू खुद ससुराल पहुंच गई। बहू के अचानक ससुराल पहुंचने पर सास-ससुर घबरा गए। फिर सास अपनी बहू को उसी तालाब के पास ले गई और वहां पर तालाब की पूजा करने को कहा। तब बहू ने पूछा कि मेरा बेटा कहां है, तो सास ने कहा कि तुम पूजा करो। लेकिन सास बहुत ज्यादा घबराई थी। उस दिन बछ बारस का दिन था।
सास मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि उसकी लाज बचा लें। तालाब की पूजा के बाद बहू ने अपने बेटे बछराज और हंसराज दोनों को पुकारा। बहू की पुकार सुनते ही दोनों बेटे कीचड़ में सने हुए उसके सामने आ गए और तब सास ने बहू को सारी बातें बता दी। इस तरह से बछराज वत्स द्वादशी व्रत से जीवित लौट आया।
धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक बछ बारस पर गाय और बछड़े की पूजा करने से घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। इस दिन कई परिवारों में गाय के दूध, दही और घी आदि नहीं खाया जाता है। गोवत्स द्वादशी गाय के प्रति सम्मान, मातृत्व और संतान के प्रति प्रेम का पर्व है।
