Sita Ashtami 2025: सीताष्टमी व्रत से प्राप्त होता है अखंड सौभाग्य

Sita Ashtami 2025: सीताष्टमी व्रत से प्राप्त होता है अखंड सौभाग्य


आज सीताष्टमी व्रत है, इसे जानकी जयंती भी कहते हैं। फाल्गुन कृष्ण की अष्टमी तिथि को जानकी जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन माता सीता और रामजी की पूजा करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है तो आइए हम आपको सीताष्टमी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। 
जानें सीताष्टमी व्रत के बारे में 
हिंदू धर्म में माता सीता को मां लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन माह में आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन माता सीता धरती पर प्रकट हुई थीं। यही कारण है कि इस दिन को जानकी जयंती के रूप में मनाया जाता है। सीता जी राजा जनक की पुत्री थीं, इसलिए उनका एक नाम जानकी भी है, यही वजह है कि जानकी जयंती को सीता अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है।

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भारतीय मास क्रम में फाल्गुन का माह संवत्, हिन्दू वर्ष का अंतिम महीना अर्थात् बारहवां महीना होता है। इस माह में शीत का प्रकोप कम हो जाता है। वातावरण उल्लासमय होने लगता है, खेतों में गेहूं, मटर की फसलें पक जाती हैं और प्रकृति में फाल्गुन की मस्ती व्याप्त होने लगती है जो होली तक चर्मोत्कर्ष पर पहुंच जाती है। फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जानकी व्रत किया जाता है। इसमें जनकसुता श्री जानकी जी का पूजन होता है। गुरूवर वशिष्ठ जी की आज्ञा से भगवान रामचन्द्र जी ने समुद्र तट की तपोमय भूमि पर बैठकर यह व्रत किया था। इसमें जौ, चावल, तिल आदि से हवन और पूए का नैवेद्य अर्पण किया जाता है। अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए यह व्रत किया जाता है। फाल्गुन कृष्ण अष्टमी के दिन श्रीरामचंद्र जी की धर्मपत्नी जनक नंदिनी जानकी प्रकट हुईं थीं इसलिए इस तिथि को ‘सीताष्टमी’ के नाम से जाना गया। कहीं-कहीं पर स्त्रियां यह व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष की नवमी को भी रखती हैं।
सीताष्टमी व्रत से घर में आती है समृद्धि 
पंडितों के अनुसार भगवान गणेश और गौरी की पूजा करके माता जानकी की पूजा की जाती है। माता सीता को पीले फूल, कपड़े और शृंगार का सामान अर्पित किया जाता है। इसके बाद भोग लगाकर सीता माता की आरती करना चाहिए। सीता जयंती पर व्रत रखने वालों को सौभाग्य, सुख और संतान की प्राप्ति होती है और परिवार में समृद्धि बनी रहती है। यह व्रत विवाहित महिलाओं के लिए लाभकारी है। इस व्रत के प्रभाव से वैवाहिक जीवन की समस्याएं दूर हो जाती हैं। सुखद दांपत्य जीवन की कामना से यह व्रत किया जाता है।
जानें माता सीता के मंत्र
श्री सीतायै नम:
श्रीरामचन्द्राय नम:
श्री रामाय नम:
ॐ जानकीवल्लभाय नमः
श्रीसीता-रामाय नम:
सीता अष्टमी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा  
सीता अष्टमी पर माता सीता की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। आप माता सीता का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं तो इस दिन विधि-विधान से उनकी पूजा अर्चना करें, साथ ही कुछ चौपाइयां भी पढ़ सकते हैं। पूजा के लिए 21 फरवरी को जानकी जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के बाद साफ कपड़े पहनकर व्रत का संकल्प लें। आप मंदिर या फिर पूजाघर में ही जानकी जयंती की पूजा कर सकते हैं। पूजा के लिए एक चौकी सजाकर उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और माता सीता एवं श्रीराम की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। सीता अष्टमी के दिन एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर अक्षतों का अष्टदल कमल बनाऐं और उस पर मां लक्ष्मी तथा जानकी की मूर्ति स्थापित करके गंध, पुष्पादि से पूजन करें।  इसके बाद रोली, अक्षत, फूल, भोग आदि अर्पित करते हुए पूजा करें और जानकी जयंती की व्रत कथा का पाठ करें। पूजा के बाद आप माता जानकी के मंत्र और चौपाइयां भी पढ़ सकते हैं और आखिर में आरती करें। फिर प्रदोषकाल के समय सामर्थ्य अनुसार जितने हो सकें, दीपक जलाएं और ब्राह्मणों को भोजन कराऐं, तत्पश्चात स्वयं भोजन करें तथा दूसरे दिन पूजन-सामग्री आदि किसी ब्राह्मण को दान दें।
सीता अष्टमी का शुभ मुहूर्त 
इस साल सीता अष्टमी 21 फरवरी को मनाया जाएगा। फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 20 फरवरी को सुबह 9:58 पर शुरू हो जाएगी और 21 फरवरी को सुबह 11:57 पर समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर गुरुवार 21 फरवरी को ही सीता अष्टमी मनाई जाएगी और पूजा-अर्चना जैसे कार्य किए जाएंगे।
सीता अष्टमी व्रत की पौराणिक कथा भी है खास 
रावण वेदवती को देखकर मोहित हो गया। वेदवती ने रावण को श्राप दिया कि वह रावण की पुत्री के रूप में जन्म लेंगी और स्वयं उसकी मृत्यु का कारण बनेंगी। रावण के घर एक कन्या का जन्म हुआ, जिसे रावण ने सागर में बहा दिया। राजा जनक और माता सुनैना ने उस कन्या को गोद ले लिया और पुत्री के रूप में स्वीकार कर उसका लालन-पालन किया। हल के सीत के टकराने से वह कलश मिला था जिससे सीता प्रकट हुई थीं इसलिए कन्या का नाम सीता रखा गया। राजा जनक की पुत्री होने के कारण सीता जी को जानकी भी कहा जाता है। सीता जी को मिथिला की राजकुमारी होने के कारण मैथिली नाम से भी जाना जाता है। सीता जी को भूमि में पाये जाने के कारण भूमिपुत्री या भूसुता भी कहा जाता है।
सीताष्टमी का महत्व 
माता सीता को मां लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है, इसलिए जानकी जयंती के दिन उनकी पूजा करने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। पंडितों के अनुसार इस दिन माता सीता की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है, खासकर महिलाओं के लिए यह दिन बहुत महत्व रखता है, क्योंकि माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल बना रहता है। यह दिन माता सीता के गुणों जैसे कि त्याग, समर्पण, साहस और पतिव्रता को याद करने और उनसे प्रेरणा लेने का दिन माना जाता है।
– प्रज्ञा पाण्डेय



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